Saturday, 21 January 2017

सहमा हुआ सा ..... कब तक?

बाहर गैस डिलीवरी वाला लड़का आया था, वो सिलेण्डर लेकर बरामदे पर खड़ा था, उसकी एक बांह से व्हेईंग मशीन लटक रही थी। उसने गैस चैक की और व्हेईंग मशीन पर सिलेण्डर फंसा कर उठाने से पहले बोला देख लीजिए। मैंने भी पैनी नजर से मशीन पर हिलती डुलती सुई पर नजर गढा दी। हाँ-हाँ ठीक है बस रख दे, कहकर मैंने उसे कूपन थमा दिया। उसने कूपन से एक पन्ना फाड़ा और एजेन्सी की रसीद पकड़ाते हुए बोला- ये लीजिए।


मेरी सहायिका जो मेरे हाथों में तकलीफ की वजह से रोज़ अपने घर के काम निपटा कर मेरे काम निपटाने आती थी ये सब बड़े ध्यान से देख रही थी। मैंने उसे देखा तो वो मुस्कुरा दी, मैंने पूछा क्या हुआ, ऐसे क्या देख रही है तो वो बोली- दीदी मैं ये देख रही हूँ कि उसने बिना बोले ही सिलेण्डर चैक किया और सिलेण्डर तौल कर भी दिखाया। जबकि हमारे इधर तो ये बोलने पर ही सिलेण्डर चैक करते हैं और तोलने का तो सवाल ही नहीं होता। मैंने उससे कहा, अरे उसे एक बार बोल देना कि भई तू सिलेण्डर हमेशा चैक करके दे और तोल कर दे। फिर वो हमेशा ये सब करेगा। इस पर वो बोली, उन्हें हर बार बोलना पड़ता है वो बुरा सा मुंह बनाकर वापस गाड़ी तक जाता है और मशीन लाता है और झटके से तोलता है।


मैंने उसे बताया कि ये उनका काम है, एक तो वो सिलेण्डर चैक करें और सही वजन करके सिलेण्डर हमें दें। उसने कहा, ‘है तो, पर ये करें जब ना


मैंने उससे कहा, वो नहीं करते इसका मतलब ये नहीं कि तुम उसे कहो भी ना। तुम्हें पूरा हक है कि अपने पैसों के बदले सही सामान तुम्हें मिल रहा है या नहीं, ये जांचने का। तुमने भी उसे सिलेण्डर के उतने ही रूपये देने हैं जितने मैं देती हूँ। फिर ये भेदभाव वो कैसे कर सकता है। बल्कि उसका तो ये फ़र्ज बनता है जो इन चीज़ों के बारे में कम जानते हैं, उनको वो ये बताये।
कभी आपने भी गौर किया हो कि गरीब क्यूं हर वक्त सहमा-सहमा रहता है, जैसे कोई गलती हो गरीब होना. और कुछ पैसे वाले हर वक्त क्यों रूआब में रहते हैं, जैसे एहसान किया हो अमीर होकर.


आज के इस वाकये से मेरे मन में ये सवाल उठने लगा। मुझे याद हो आया कि कुछ दिन पहले जब मैं एक कैमिस्ट की दुकान पर कुछ दवाईयां लेने गयी। मैंने देखा एक रूआंसा सा आदमी डाक्टर की लम्बी चौड़ी पर्ची लिये दुकान पर सकुचाया सा खड़ा था। कैमिस्ट की दुकान किसी शोरूम से कम नहीं थी। वहाँ और भी लोग खड़े थे। मुझे देखते ही सेल्समैन ने मुझसे दवा का पूछा और मेरी बताई दवा निकालने लगा। वहां पर 3-4 सेल्समैन थे जो सबकी दवाईयां बारी-बारी दे रहे थे। मेरी नज़र फिर उस आदमी पर पड़ी जो अभी भी अपनी पर्ची हाथ में लिए सेल्समैन की तरफ टकटकी लगाये देख रहा था। तभी कैश कांउटर पर बैठे अंकल जी ने सेल्समैन को ज़ोर की आवाज़ लगाई, अरे इसको पूछो इसे क्या चाहिए? उसके चेहरे पर मुस्कराहट..., कि अब उसका नम्बर आयेगा। सेल्समैन ने उसकी तरफ आँखों से इशारा किया जैसे पूछ रहा हो- हाँ भई क्या है? उसने उस सेल्समैन की तरफ डाक्टर का पर्चा बढ़ा दिया। सेल्समैन उस पर लिखी दवाईयां निकालने लगा, उसकी दवाईयों का टोटल करके वो बोला, एक हजार एक सौ तीस रूपये हुए टोटल, है क्या? वो बोला, ‘‘हाँ बाबू जी, ये गिन लो‘‘। 


मैं ये सब कनखियों से देख रही थी, और सोच रही थी इस गरीब आदमी ने दवा के पैसे पूरे देने हैं, गरीबी पर कोई छूट ये दवा विक्रेता इसे देने वाला है नहीं। इसकी बारी भी सबसे आखिर में, दवा लायक पैसे हैं भी या नहीं भी इससे पूछा गया और उस पर उसकी झिझक। गरीबी पर इतना अत्याचार क्यों?  क्या ये काफी नहीं है कि वो गरीब है! ये विरोधाभास आखिर कब तक? समाज का ये दोहरा मापदंड आखिर कब तक। गरीब की हाड़-तोड़ मेहनत से कमाये गए पैसों का मूल्य तो सबसे ज्यादा आंका जाना चाहिए। फिर क्यूं खुद गरीब अपनी कमाई को छोटी समझकर हमेशा सकुचाया सा रहता है?


क्या हो कि वो भी मेहनत से कमाए गए रुपयों को खर्चते हुए रुआब नहीं भी दिखाए... तो कम से कम सकुचाये नहीं.


अनीता 

8 comments:

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  2. बहुत अच्छा सरल एवं सहज शब्दो का प्रयोग।

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  3. बहुत अच्छा सरल एवं सहज शब्दो का प्रयोग।

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