Tuesday, 7 February 2017

ख्वाहिशे

ख्वाहिशें.....


आपकी बातों सी, मुस्कराहटों सी
रूप ले रही हैं ख्वाहिशें,
अब मेरी।
पैदल नहीं- उड़ रही हैं
पहन रही है रंग नित नये, ख्वाहिशें
अब मेरी।

खिल रहे हैं फूल हर रंग के
ले रहा विस्तार हर रंग यहाँ,
रंग कर रहा गुलज़ार हर चमन यहाँ;
कि-
बस यही दस्तूर हर चमन का है;
खिलना उसे हर हाल में है यहाँ
हर वक्त
है किसी का,
आना-जाना यहाँ
उसने तो रख छोड़नी है तैयारियाँ।

कभी गुलजार वो चम्पा, कुमुदिनी से है,
कभी सदाबहार, चंद्रमल्लिका, चांदनी से है,
कभी गुलाब, कनक लता से ही है अटा पड़ा।
कौन जाने मुस्कुराने कोई
आ जाये यहाँ,
उसने तो रख छोड़नी है तैयारियाँ।

ले रहा है मन्
नित नयी सांसें नयी
धड़कन यहाँ।
इन नयी सांसों सी
नयी सुगंध सी
मुस्करा उठी है, ख्वाहिशें
अब मेरी।


अनीता 

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