Monday, 30 January 2017

अनन्त तक....


लगता है तुम आस पास ही हो
बिल्कुल पास;
स्पर्श तो नहीं कर सकती
पर;
महसूस करती हूँ रोज हर पल-पल,
जीवन रफ्तार पर है सतत् प्रवाहमान् समय के साथ
पर;
तुम अनुभूति हो गये हो, सस्नेह
लगता है जैसे मिट्टी का भुरभुरापन
हाथों में महसूस हो रहा हो और हो;
शीतल बर्फ कणों का ठंडा चुभन भरा
अहसास।।

तुम ऊष्मा हो, प्रायाण भी हो जीवन का
प्रेम की अनुभूति हो, आंसू भी हो,
तुम्हारे स्नेह की अनुभूति
जीवन की रफ़्तार कभी बढ़ जाती है तुम्हारे
मधुर हाथों के मुलायम कोमल प्यार भरे स्नेह से
गुस्सा काफूर हो जाता है!

छू दूँ तो पाती हूँ प्यार भरा स्नेहिल
ऊष्मित हाथों की हथेलियों की छुअन;
तेज सांसों का उतार-चढ़ाव
हृदय/दिल की धड़कन की धीमी ध्वनि
सब याद दिलाती रहेंगी अनन्त तक,
अनन्त प्यार तुम्हारा।।
अनीता

Saturday, 28 January 2017

बेटा ना होने का ऐसा गम तो नहीं देखा मैंने कभी अपने मम्मी-डैडी के चेहरे पर। और किसी बात में कभी ऐसा महसूस भी नहीं होने दिया उन्होंने। पर एक बार बातचीत के दौरान मैंने मम्मी को किसी से कहते सुना कि फलां के एक बेटा और एक बेटी है भगवान से मांगे हुए जैसे। कुछ दिन लगातार मेरे जेहन में बिन मांगी मुराद सा पैदा हो जाने की फीलिंग आती रही। 

हम दो बहनें थीं, बात उन दिनों की है जब हम मुम्बई (उस समय बम्बई कहा करते थे) में रहा करते थे। मम्मी की आस-पास की सहेलियां मम्मी को हिदायत देतीं, हमसे कहती तुम्हें भाई चाहिए या बहन। मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था, ये सब क्या कह रही हैं। कहाँ से आयेगा भाई-बहन? आजकल के बच्चों की तरह स्मार्ट नहीं थे हमारे दौर के बच्चे, ना ही टी0वी0 पर ऐसा कुछ दिखाया जाता था जिससे हमें कुछ पता चलता। बात उस दौर की है जब हम टी0वी0 देखने भी आर्मी एरिया के अंदर जाते थे, वो भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन। काॅलोनियों में दोनों ओर की बिल्डिंग पर बड़े से पर्दे पर फिल्में दिखाई जाती थी। ऐसे ही किसी पर्दे पर मैंने हेमा मालिनी की एक पिक्चर देखी थी- धर्मात्मा। 

एक दिन जब हम सुबह उठे तो पता चला कि मम्मी घर पर नहीं है। रात को मम्मी को अस्पताल ले गये थे। मैंने देखा डैडी शेविंग कर रहे थे जो उनका रोज का काम था। एक छोटा सा फोल्डिंग वाला आईना पकड़े जिसे वो बीच-बीच में टेबल पर रख देते जब उन्हें एक हाथ से गाल को एक ओर खिंचना होता था जिससे रेज़र से गाल कट जाये। उन दिनों मेरी एक दीदी आयी हुई थी हमारे साथ रहने को वो हमें दूध का कप दे रही थी पीने को। तभी रेडियो में एक गाना बजना शुरू हुआ- मेरे घर आई एक नन्हीं परी, एक नन्हीं परी..... । अभी एक लाईन भी पूरा नहीं हुआ था कि मेरे डैडी ने उठकर रेडियो आॅफ कर दिया। तब दीदी ने बताया तुम्हारी छोटी बहन हुई है। जब तुम स्कूल से आ जाओगे तब चलेंगे मम्मी और बच्चे से मिलने अस्पताल। शाम को हम सब नेवी नगर कोलाबा स्थित अश्विन हाॅस्पिटल पहुंचे, जहाँ हम मम्मी और अपनी छोटी बहन से मिले। 

मुझे काफी साल बाद पता चला कि मेरे मम्मी-डैडी बेटे की आस में एक बार हाजी अली की दरगाह पर भी हो आये थे। पर ऊपर वाले ने इस रूप में भी उनकी अर्जी नहीं सुनी। खै़र आज मेरी वही छोटी बहन गुड़गाँव में एक बी0पी0ओ0 में सीनियर पोस्ट पर है। मेरे मम्मी डैडी का उससे स्नेह भी हम दो बड़ी बेटियों से हमेशा ज्यादा रहा। गुजरते समय के साथ लड़के-लड़की का भेद कम हुआ है या वैसा ही है ये कह पाना आज भी हर परिवार और उसके सदस्यों की मानसिकता या सोच पर निर्भर है। परिवार के संस्कार लिंग भेद को समाप्त करने में अपनी बेहतर भूमिका निभा सकते हैं। ये जो आजकल लड़कों को ठीक करने या लड़कियों से सही बर्ताव करने या तमीज से पेश आने की बातें सभी जगह साहित्य से राजनीति तक और गाँव से राष्ट्रीय स्तर तक की जा रही है इस लिंग भेद के दंगल में बेटी या स्त्रियों को भूल कर भी कम ना आंका जाए। मेरा मानना है कि लड़के लड़की में भेद को खत्म करने की शुरूआत हर परिवार को अपने घर से करनी होगी।

Wednesday, 25 January 2017

है उन्मुक्त स्वतंत्र नील गगन;
धरती पर बिखरी है हरियाली अनन्त,
जीवन बढ़ रहा, पल रहा है जीवंत.


स्मृतियों के नीड़ मे पल्लवित हो रही
हैं नवजीवन की संभावनाएं अनन्त कर्म की बिपाशा- दे रही है आकांक्षाओं को थाह देने की कोशिशें.


चलो आज भी महसूस कर रहे हैं
हम अपने आस पास
जीवंत भावनाओं
चुनौतियों व् आशाओं-विश्वासों का भविष्य स्वतंत्र!

Monday, 23 January 2017

मिट्टी का घर- घर मिट्टी का........


मिट्टी के घर, लीची के बाग, पानी भरे बासमती के खेत;
खेतों की मेंढ पर अमरूद और आम के दरख़्त,
गाँव और बहुत से वाला वाला;
ये था पहले का देहरादून।

इतना सब कुछ नहीं था पहले जो अब है;
लोग हैं, नये-नये चेहरे हैं
विशाल भवन, माॅल, फ्लाई ओवर, चौड़ी सड़कें हैं,
सड़कों के नीचे दफन नहरें हैं।

पहले के नींबू, चकोतरे, आड़ू, कुलुम, पपीते और बब्बूगोसा
चंपा, चमेली, सदाबहार, गुलाब, हरसिंगार, गुड़हल, गेंदा, चांदनी,
पीले, सफेद, गुलाबी कनेर, की जगह
गमलों में मनी प्लान्ट, कैक्टस, क्रोटन हैं।

गली अब सुनसान नहीं रही
दिन भर व्यस्त रहती है;
लोग हैं जो हैं वो कम हैं
दीवारों और घरों के गेट से बाहर
निकलने वाले पड़ोसी वही पुराने हैं पर कम हैं।

गली के भीतर बने आदमी के मकानों ने-
पेड़ों के घर; उन पर रहती गोरैया, मैना और काले कौवे
आधे पानी भरे खेतों में बोलती टिटहरी, शाम के धुंधलके के झिंगुर,
मेंढक की टर्र-टर्र सबको निगल लिया है।

आदमी हैं पर पहचान के नहीं
बड़े घर वाले बहुत छोटे हैं;
मिट्टी के घर को घूरकर देखते हैं
मानो वो मिट्टी में उगा कुछ ना खाते हों,

वो रिमोट हैं, वो रोबोट हैं वो ए टी एम हैं वो मशीन हैं
वो आदमी नहीं - मालिक के नौकर, नौकर के मालिक हैं।
मिट्टी से ऊपर कुछ भी नहीं
मिट्टी का घर बदल रहा है।
साथ में पास-पड़ोस बदल रहा है।

गली सुनसान नहीं रही,
दोनों तरफ उसकी सांसें रोकती हैं-
नये नये घरों की चारदीवारियां
चारदीवारियों में अटके लोहे और स्टील के गेट,
उनके भीतर सुन्दर सजीले घरों में दर्पीले पास-पड़ोसी
नहीं है तो बस-
वो पहले जैसी ऊष्मा, ऊर्जा और प्रेम
वो गेट के बाहर ही ठिठका बैठा है कोने पर।

गली यानि हमारी कैनाल स्ट्रीट
यहाँ बहती गीली और ठंडे पानी की नहर;
सूखी है दबी कुचली और मैली सी है,
नहर सूख गयी पर गंगा विहार उग आया है।

नुक्कड़ का आम पहले ही दम तोड़ गया
गली का वो मिट्टी का घर, अपने आप में अलग था;
पर पूरे परिवार का अपना था
मिट्टी की दीवारों का बना लेकिन मजबूत था,
छत पर मिट्टी के घरौंदे में मधुमक्खी का घर
गरम टीन की छत पर बिल्ली का पसरना
छत और मिट्टी की दीवार के बीच कुछ गोरैया भी रहती थी।
रोज सुबह उड़ती नीले आसमान में
सांझ हो लौट आती मिट्टी के घर की छत पर।
पूरी रात देखती सपने नये घर के
जैसे ठीक उस मिट्टी के घरवाले देखते थे।
सपनों को पूरा करने के लिए
मिट्टी के घर ने जिद्द छोड़ दी
नये घर के लिए।

अनीता
(दिनांक- 24.01.2017) स्थान- कौलागढ़ 
जब हमारा पुराना घर तोड़ा जाने लगा चाची के घर के लिए।



तुम कहाँ हो 
तुम जहाँ भी हो,
 जहाँ कहीं भी हो;
  बस; रेतीला स्पर्श न हो;
   तट पर रहकर तुम
     नदी से दूर न हो,
      बताओ तुम कहाँ हो.
अँधेरे भी घुप्प अँधेरे नहीं तुम बिन;
  उजाला भी है उदास लगता- तुम बिन,
   तुम लगते हो छा गए मेरे - भूत, वर्तमान व् भविष्य के अस्तित्व पर,
     तुम जहाँ भी हो- मेरे आस पास ही हो
      हमेशा-हमेशा 
रात का बियाँबान सन्नाटा काटता है!
  दिन का उजाला शहर छानता है!
    सडकों पे चलते काँपता है मन;
      धड़कती धमनियां तरल रक्त उफनता है;
        दिलो दिमाग पर है - यादें तुम्हारी
          स्मृतियाँ, स्नेह तुम्हारा, नर्म स्पर्श हाथों
            का बाल सहलाता है-
बताओ तुम कहाँ हो - यहाँ हो कि वहाँ हो !



*अनीता 

Saturday, 21 January 2017

सहमा हुआ सा ..... कब तक?

बाहर गैस डिलीवरी वाला लड़का आया था, वो सिलेण्डर लेकर बरामदे पर खड़ा था, उसकी एक बांह से व्हेईंग मशीन लटक रही थी। उसने गैस चैक की और व्हेईंग मशीन पर सिलेण्डर फंसा कर उठाने से पहले बोला देख लीजिए। मैंने भी पैनी नजर से मशीन पर हिलती डुलती सुई पर नजर गढा दी। हाँ-हाँ ठीक है बस रख दे, कहकर मैंने उसे कूपन थमा दिया। उसने कूपन से एक पन्ना फाड़ा और एजेन्सी की रसीद पकड़ाते हुए बोला- ये लीजिए।


मेरी सहायिका जो मेरे हाथों में तकलीफ की वजह से रोज़ अपने घर के काम निपटा कर मेरे काम निपटाने आती थी ये सब बड़े ध्यान से देख रही थी। मैंने उसे देखा तो वो मुस्कुरा दी, मैंने पूछा क्या हुआ, ऐसे क्या देख रही है तो वो बोली- दीदी मैं ये देख रही हूँ कि उसने बिना बोले ही सिलेण्डर चैक किया और सिलेण्डर तौल कर भी दिखाया। जबकि हमारे इधर तो ये बोलने पर ही सिलेण्डर चैक करते हैं और तोलने का तो सवाल ही नहीं होता। मैंने उससे कहा, अरे उसे एक बार बोल देना कि भई तू सिलेण्डर हमेशा चैक करके दे और तोल कर दे। फिर वो हमेशा ये सब करेगा। इस पर वो बोली, उन्हें हर बार बोलना पड़ता है वो बुरा सा मुंह बनाकर वापस गाड़ी तक जाता है और मशीन लाता है और झटके से तोलता है।


मैंने उसे बताया कि ये उनका काम है, एक तो वो सिलेण्डर चैक करें और सही वजन करके सिलेण्डर हमें दें। उसने कहा, ‘है तो, पर ये करें जब ना


मैंने उससे कहा, वो नहीं करते इसका मतलब ये नहीं कि तुम उसे कहो भी ना। तुम्हें पूरा हक है कि अपने पैसों के बदले सही सामान तुम्हें मिल रहा है या नहीं, ये जांचने का। तुमने भी उसे सिलेण्डर के उतने ही रूपये देने हैं जितने मैं देती हूँ। फिर ये भेदभाव वो कैसे कर सकता है। बल्कि उसका तो ये फ़र्ज बनता है जो इन चीज़ों के बारे में कम जानते हैं, उनको वो ये बताये।
कभी आपने भी गौर किया हो कि गरीब क्यूं हर वक्त सहमा-सहमा रहता है, जैसे कोई गलती हो गरीब होना. और कुछ पैसे वाले हर वक्त क्यों रूआब में रहते हैं, जैसे एहसान किया हो अमीर होकर.


आज के इस वाकये से मेरे मन में ये सवाल उठने लगा। मुझे याद हो आया कि कुछ दिन पहले जब मैं एक कैमिस्ट की दुकान पर कुछ दवाईयां लेने गयी। मैंने देखा एक रूआंसा सा आदमी डाक्टर की लम्बी चौड़ी पर्ची लिये दुकान पर सकुचाया सा खड़ा था। कैमिस्ट की दुकान किसी शोरूम से कम नहीं थी। वहाँ और भी लोग खड़े थे। मुझे देखते ही सेल्समैन ने मुझसे दवा का पूछा और मेरी बताई दवा निकालने लगा। वहां पर 3-4 सेल्समैन थे जो सबकी दवाईयां बारी-बारी दे रहे थे। मेरी नज़र फिर उस आदमी पर पड़ी जो अभी भी अपनी पर्ची हाथ में लिए सेल्समैन की तरफ टकटकी लगाये देख रहा था। तभी कैश कांउटर पर बैठे अंकल जी ने सेल्समैन को ज़ोर की आवाज़ लगाई, अरे इसको पूछो इसे क्या चाहिए? उसके चेहरे पर मुस्कराहट..., कि अब उसका नम्बर आयेगा। सेल्समैन ने उसकी तरफ आँखों से इशारा किया जैसे पूछ रहा हो- हाँ भई क्या है? उसने उस सेल्समैन की तरफ डाक्टर का पर्चा बढ़ा दिया। सेल्समैन उस पर लिखी दवाईयां निकालने लगा, उसकी दवाईयों का टोटल करके वो बोला, एक हजार एक सौ तीस रूपये हुए टोटल, है क्या? वो बोला, ‘‘हाँ बाबू जी, ये गिन लो‘‘। 


मैं ये सब कनखियों से देख रही थी, और सोच रही थी इस गरीब आदमी ने दवा के पैसे पूरे देने हैं, गरीबी पर कोई छूट ये दवा विक्रेता इसे देने वाला है नहीं। इसकी बारी भी सबसे आखिर में, दवा लायक पैसे हैं भी या नहीं भी इससे पूछा गया और उस पर उसकी झिझक। गरीबी पर इतना अत्याचार क्यों?  क्या ये काफी नहीं है कि वो गरीब है! ये विरोधाभास आखिर कब तक? समाज का ये दोहरा मापदंड आखिर कब तक। गरीब की हाड़-तोड़ मेहनत से कमाये गए पैसों का मूल्य तो सबसे ज्यादा आंका जाना चाहिए। फिर क्यूं खुद गरीब अपनी कमाई को छोटी समझकर हमेशा सकुचाया सा रहता है?


क्या हो कि वो भी मेहनत से कमाए गए रुपयों को खर्चते हुए रुआब नहीं भी दिखाए... तो कम से कम सकुचाये नहीं.


अनीता 

मेरी कविता

मेरी कविता 

वक़्त की रफ्तार से 
तेज हो गयी 
स्मृतियाँ 
तुम्हेँ स्मरण करातीँ 
है कि तुम 
जब तुम होते हो 
साथ 
सब कुछ हल्का 
उड़ने लगता है-
फलक के पार 
अनन्त ब्रह्माण्ड की 
ओर
न होना.. पास भी लगता है..
पर तुम हो 
तुम हो फलक के नीचे जमीं पर साथ साथ...... 

अनीता  



"अँधेरा आने के लिए खिड़की दरवाजे की जरुरत नहीं होती .

नहीं तो रात में आते हुए अँधेरे को खिड़की-दरवाजे बंद कर रोक देते, 

कमरे में इकट्ठे हो गए अँधेरे को बुहार देते."


साभार - खिलेगा तो देखेंगे - 
* विवेक कुमार शुक्ल
 

कभी लगा पढ़ा लिखा समाज अनपढ़ है-

आज लड़कियों के पहनावे को लेकर जो बवाल मचा हुआ है या यूं कहें कि वर्ष 2017 के आगाज़ के पहले दिन हमारे देश की सिलिकाॅन वैली बंग्लौर के सर्वाधिक माॅडर्न आधुनिक तकनीकी ज्ञान वाले नवधनाढ्य वर्ग और 21वीं सदी के युवाओं ने जो हरकतें नये वर्ष का उत्साह मना रही महिलाओं और युवतियों के साथ की उसकी जितनी भी निंदा की जाए शायद कम ही होगा। ऐसे में यह कहा जाना अनुचित नहीं होगा कि आज के इस काल खण्ड में सबसे ज्यादा अनपढ़, गंवार और बेशर्म- बंग्लौर में महिलाओं से अश्लीलता करने वाला पढ़ा-लिखा समाज ही है। 
नये साल के जश्न के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में इस प्रकार की घटनायें और भी सुनाई दी। इस बारे में सोचते हुए यह लगता है कि इन सांस्कारिक पृष्ठभूमि और तथाकथित आधुनिकता के फूहड़ मनोविकृति वाले इस समाज से अच्छे तो वे मजदूर और गरीब वर्ग के या निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों के सदस्य हैं जो भारत के अन्य महानगरों की तरह यहाँ देहरादून में राजधानी के नवनिर्माण में लगे हैं। मैंने इस शहर में बन रहे बड़े निर्माण कार्यों में लगे मजदूर वर्ग के परिवारों की कामगार महिलाओं और पुरूषों को बिना बाथरूम की सुविधा वाले स्थानों पर सीमित कपड़े लपेटे खुले में स्नान करते हुए देखा है। तब सोचती हूँ कि क्या लड़कियों या महिलाओं के पहनावे से ही क्या पुरूष वर्ग को ये कैसे लगने लगता है कि जिस महिला या युवती ने आधुनिकयुगीन पहनावे को अपनाया है वह तथाकथित संकीर्ण मानसिकता वाले पुरूष वर्ग के लिए एक सरल सहज रूप से उपलब्ध वस्तु है या माल है। अगर ऐसा ही हो तो फैशन शो में जाने वाले दर्शक तो माॅडल्स को रैम्प पर चलने ही ना दें। नये साल की मस्ती शराब और ड्रग्स का सुरूर, न घरवालों का डर, पुलिस और प्रशासन की लचर सुरक्षा व्यवस्थायें, उद्दण्डी और गैर-जिम्मेदार लेकिन अधिक पैसा कमाने वाले संचार तकनीकी युग के प्रतीक ये युवा महिलाओं का आदर तक करना नहीं जानते। घुटने से ऊपर तक के वस्त्र पहने युवती ही इनकी हवस या छेड़छाड़, ईव टीज़िंग का शिकार हुई हों ये सच नहीं है। 
पूर्णतः भारतीय वेशभूषा में साड़ी-धोती लपेटे या बुर्का ओढ़े महिलाओं को भी पितृसत्तात्मक पुरूष समाज सिर्फ उपभोग की वस्तु समझता है। जहाँ महिलायें और युवतियां तकनीकी शिक्षा, लेखन, संगीत, नृत्य, खेलकूद, व्यापार सहित अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ने लगती हैं वहीं पुरूष समाज (हमेशा नहीं) भीतर ही भीतर अह्म, अहंकार  और पुरूषत्व के तथाकथित झूठ के साथ कुत्सित् विचारधाराओं के साथ महिलाओं को छेड़छाड़ या ईव-टीज़िंग का साधन समझने लगते हैं। यह वास्तव में संस्कार और लालन-पालन पोषण के तौर तरीकों में किसी ना किसी कमी को उजागर करते हैं। उत्सवों और चैराहों पर बिखर जाता है। यह स्थिति महिलाओं से ज्यादा पुरूष समाज के लिए चिन्ताजनक होनी चाहिए। या वे महसूस करें कि अकेली युवती, बच्ची और महिला उसके लिए अवसर नहीं हैं बल्कि उसकी सुरक्षा करना उसकी जिम्मेदारी की पहली सीढ़ी है। 



नयी कथा यात्रा ......


My Cherry Blossom

चेरी ब्लाॅसम के फ़ूलों सा तुम्हारा प्यार प्रिये रखा है मैंने आज भी संजोकर! ये मत पूछो... कहाँ? ये पूछो- कहाँ-कहाँ... जेहन में, दिल की अतल ग...