मिट्टी का घर- घर मिट्टी का........
मिट्टी के घर, लीची के बाग, पानी भरे बासमती के खेत;
खेतों की मेंढ पर अमरूद और आम के दरख़्त,
गाँव और बहुत से वाला वाला;
ये था पहले का देहरादून।
इतना सब कुछ नहीं था पहले जो अब है;
लोग हैं, नये-नये चेहरे हैं
विशाल भवन, माॅल, फ्लाई ओवर, चौड़ी सड़कें हैं,
सड़कों के नीचे दफन नहरें हैं।
पहले के नींबू, चकोतरे, आड़ू, कुलुम, पपीते और बब्बूगोसा
चंपा, चमेली, सदाबहार, गुलाब, हरसिंगार, गुड़हल, गेंदा, चांदनी,
पीले, सफेद, गुलाबी कनेर, की जगह
गमलों में मनी प्लान्ट, कैक्टस, क्रोटन हैं।
गली अब सुनसान नहीं रही
दिन भर व्यस्त रहती है;
लोग हैं जो हैं वो कम हैं
दीवारों और घरों के गेट से बाहर
निकलने वाले पड़ोसी वही पुराने हैं पर कम हैं।
गली के भीतर बने आदमी के मकानों ने-
पेड़ों के घर; उन पर रहती गोरैया, मैना और काले कौवे
आधे पानी भरे खेतों में बोलती टिटहरी, शाम के धुंधलके के झिंगुर,
मेंढक की टर्र-टर्र सबको निगल लिया है।
आदमी हैं पर पहचान के नहीं
बड़े घर वाले बहुत छोटे हैं;
मिट्टी के घर को घूरकर देखते हैं
मानो वो मिट्टी में उगा कुछ ना खाते हों,
वो रिमोट हैं, वो रोबोट हैं वो ए टी एम हैं वो मशीन हैं
वो आदमी नहीं - मालिक के नौकर, नौकर के मालिक हैं।
मिट्टी से ऊपर कुछ भी नहीं
मिट्टी का घर बदल रहा है।
साथ में पास-पड़ोस बदल रहा है।
गली सुनसान नहीं रही,
दोनों तरफ उसकी सांसें रोकती हैं-
नये नये घरों की चारदीवारियां
चारदीवारियों में अटके लोहे और स्टील के गेट,
उनके भीतर सुन्दर सजीले घरों में दर्पीले पास-पड़ोसी
नहीं है तो बस-
वो पहले जैसी ऊष्मा, ऊर्जा और प्रेम
वो गेट के बाहर ही ठिठका बैठा है कोने पर।
गली यानि हमारी कैनाल स्ट्रीट
यहाँ बहती गीली और ठंडे पानी की नहर;
सूखी है दबी कुचली और मैली सी है,
नहर सूख गयी पर गंगा विहार उग आया है।
नुक्कड़ का आम पहले ही दम तोड़ गया
गली का वो मिट्टी का घर, अपने आप में अलग था;
पर पूरे परिवार का अपना था
मिट्टी की दीवारों का बना लेकिन मजबूत था,
छत पर मिट्टी के घरौंदे में मधुमक्खी का घर
गरम टीन की छत पर बिल्ली का पसरना
छत और मिट्टी की दीवार के बीच कुछ गोरैया भी रहती थी।
रोज सुबह उड़ती नीले आसमान में
सांझ हो लौट आती मिट्टी के घर की छत पर।
पूरी रात देखती सपने नये घर के
जैसे ठीक उस मिट्टी के घरवाले देखते थे।
सपनों को पूरा करने के लिए
मिट्टी के घर ने जिद्द छोड़ दी
नये घर के लिए।
अनीता
(दिनांक- 24.01.2017) स्थान- कौलागढ़
जब हमारा पुराना घर तोड़ा जाने लगा चाची के घर के लिए।