तुम कहाँ हो तुम जहाँ भी हो,
जहाँ कहीं भी हो;
बस; रेतीला स्पर्श न हो;
तट पर रहकर तुम
नदी से दूर न हो,
बताओ तुम कहाँ हो.
अँधेरे भी घुप्प अँधेरे नहीं तुम बिन;
उजाला भी है उदास लगता- तुम बिन,
तुम लगते हो छा गए मेरे - भूत, वर्तमान व् भविष्य के अस्तित्व पर,
तुम जहाँ भी हो- मेरे आस पास ही हो
हमेशा-हमेशा
रात का बियाँबान सन्नाटा काटता है!
दिन का उजाला शहर छानता है!
सडकों पे चलते काँपता है मन;
धड़कती धमनियां तरल रक्त उफनता है;
दिलो दिमाग पर है - यादें तुम्हारी
स्मृतियाँ, स्नेह तुम्हारा, नर्म स्पर्श हाथों
का बाल सहलाता है-
बताओ तुम कहाँ हो - यहाँ हो कि वहाँ हो !
*अनीता


