Thursday, 30 March 2017

Tum kahan ho!

तुम कहाँ हो 
तुम जहाँ भी हो,
 जहाँ कहीं भी हो;
  बस; रेतीला स्पर्श न हो;
   तट पर रहकर तुम
     नदी से दूर न हो,
      बताओ तुम कहाँ हो.
अँधेरे भी घुप्प अँधेरे नहीं तुम बिन;
  उजाला भी है उदास लगता- तुम बिन,
   तुम लगते हो छा गए मेरे - भूत, वर्तमान व् भविष्य के अस्तित्व पर,
     तुम जहाँ भी हो- मेरे आस पास ही हो
      हमेशा-हमेशा 
रात का बियाँबान सन्नाटा काटता है!
  दिन का उजाला शहर छानता है!
    सडकों पे चलते काँपता है मन;
      धड़कती धमनियां तरल रक्त उफनता है;
        दिलो दिमाग पर है - यादें तुम्हारी
          स्मृतियाँ, स्नेह तुम्हारा, नर्म स्पर्श हाथों
            का बाल सहलाता है-
बताओ तुम कहाँ हो - यहाँ हो कि वहाँ हो !


*अनीता 

Tuesday, 21 March 2017

तेरी बेबाकी......

तेरी बेबाकी से ...
बेबाक होना आया,
जिंदादिली किस चिड़िया का नाम है-
 अब ये समझ आया,
बेबाकी को मान बैठे थे गुनाह।
वो गुनाह करके;
 जीने का क्या है मजा
अब वो मज़ा समझ आया।

तेरी हंसी से हंस पड़े हम भी
क्या है हंस कर जीना ये भी
अब समझ आया।
तूने अपना बनाया,
तो सबको अपना बनाने में क्या है मजा,
अब वो मजा समझ आया।
दामन में भर कर ग़म ज़माने के
अपने हिस्से की खुशियां लुटाकर जीना
अब समझ आया।

चारदीवारी में तो सब मिलकर रहते हैं,
चारदीवारी के बाहर
सरहद के पार तक,
क्या है मिलकर रहना अब समझ आया।
क्या है ऐसे जीने में मजा
अब वो मजा समझ आया।
तुझको देखा तो ज़िन्दगी का हर मजा
समझ आया।

अनीता मैठाणी

Sunday, 12 March 2017

होली.....

होली.....

होली का रंग हाथ से उतर कर
चेहरे को गुलाबी करता हुआ
मन में बस जाता है,
याद बनकर।
हर साल बढ़ती उम्र के साथ
होली का रंग और स्वरूप
बदलता चला जाता है।

इस बरस होली कुछ ख़ास है,
पहाड़ों ने फिर से मखमली बर्फ की चादर ओढ़ ली है।
और गाँवों ने ओढ़ ली बासंती बयार्।
अबीर, गुलाल, बुरांस, फ्यूंली, टेसू के रंग
गाँव की धार में उड़ते हुए,
गीले गातों पर चिपक रहे हैं।

फागुनी बयार् से सराबोर मन भागने लगा है,
सोचते हुए कि;
फिर बसंत के साथ बिदा हो जाएगा हेमंत।
और फिर-
अगले बरस फूलों की मुस्कुराहट और खुशबू
साथ लिए फिर आएगा बासंती बयार् के साथ,
शीत के बाद फिर-फिर बसंत।

अनीता मैठाणी

Friday, 3 March 2017

स्पर्श ...

एक रोज की बात] जब;
दायीं हथेली पर तुम्हारे
बांयी हथेली की तीन उंगलियों का स्पर्श
महसूसा था मैंने।
सिर्फ हथेलियां महसूसतीं
तब तलक ठीक था]
पर रूह तक भीग गयी उसमें
महसूस कर लिया उसने भी उसे;
जिसे स्पर्श कहते हैं।

बस गया है वो अब]
निष्प्राण होने तक
भुलाया नहीं जा सकेगा।
नर्म-गर्म कुछ गीला सा- गुदगुदाता हुआ
अहसास बन गया है वो स्पर्श!
जिसने छुआ तो हथेली को था
पर अहसास की तरह भिगो गया
मेरा पूरा वजू़द।

जो दे जाता है कभी
तुम्हारी यादों की दस्तक
दिल में मीठी चुभन की तरह]
वो अतिरेक था प्यार का
जो क्षणिक होकर भी ठहर गया(
और सदा रहेगा मेरे साथ
वो स्पर्श!!

अनीता


My Cherry Blossom

चेरी ब्लाॅसम के फ़ूलों सा तुम्हारा प्यार प्रिये रखा है मैंने आज भी संजोकर! ये मत पूछो... कहाँ? ये पूछो- कहाँ-कहाँ... जेहन में, दिल की अतल ग...