Saturday, 15 April 2017

कुछ अल्फ़ाज़ बहुत बोलते हैं ...


कुछ अल्फ़ाज़ बहुत बोलते हैं ...

कुछ यूं उलझी हूँ
एहसास और जज़्बात में,
तेरे आने की खुशी है या
तेरे चले जाने का ग़म है,
आँधी सा है तेरा आना
एहसास की जमीं पर आकर
तेरा यूं बरस जाना
भिगो कर एहसास से
यूं तेरा इश़्क से मिलाना
इश़्क का फलसफ़ा बताना।

कुछ कहते-सुनते वो तेरा
बांट लेना चंद लम्हे,
संग मेरे फिर तेरा वो
स्याह तनहाई में
दीये कुछ यूं जलाना
रोशन दीये की लौ में तेरा
मुझे रोशनी से मिलाना
कुछ उमंगे जगाना
उमंगों से फिर मुझे मिलाना
एहसास और जज़्बात के फलसफ़े बताना।



और जाते-जाते वो तेरा
स्याह तनहाई के संग मेरे
कुछ अल्फ़ाज़, वो लम्हात् मेरे
और मुझसे वो मेरा
सब ले जाना
फिर मेरा उसी उलझन में
उलझ कर रह जाना
चंद रोशनी के बदले
मेरा वो सब चला जाना
बची सिमटी हुई सी मैं।

स्मृतियां क्षीण होने तक।
इश़्क को कोसती।
इश़्क का आयतन
बनाती-बिगाड़ती, सोचती
भावनायें बुरी नहीं होती सदैव।
कष्ट भी स्थायी नहीं होता
उससे डरना ठीक नहीं।
डर गलत होता है,
निडरता उच्छृंखलता को जन्म देती है।
उच्छृंखलता कभी अच्छी नहीं होती।
* अनीता मैठाणी

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