लाली बुढ़िया
* अनीता मैठाणी
बस से उतरते ही मैं तेज कदमों से गेट की तरफ बढ़ने लगती हूँ, तभी मेरी नज़र दीवार से सटकर एक कोने पर बैठी लाचार बुढिया पर पड़ती है। वो जैसे मेरे देखने का ही इंतज़ार कर रही हो मेरे देखते ही हाथ से खाने का इशारा करती है। मैं मुस्कराते हुई आगे बढ़ती हूँ और अपने कंधे से झूल रहे थैले में हाथ डालकर दर्जन भर लिये केले में से चार केले उसके हाथ में थमा देती हूँ। उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती है। जवाब में मैं भी मुस्करा देती हूँ। पलट कर ज्यों ही आगे बढ़ती हूँ तो अचानक ख्याल आता है कि क्यूँ ना एक दस का नोट भी दे दूँ। एक तो सर्दियों का मौसम और उस पर सुबह का समय, जाने इस ठण्ड में उसका मन केला खाने का करे ना करे। पर्स से एक दस का नोट निकालकर पलटती हूँ और नोट उसकी तरफ बढ़ा देती हूँ।
एक बार फिर बढ़ जाती हूँ गेट की तरफ। ठंड से ठिठुरती एक आवाज मेरे कानों से टकराती है- बेटी, भगवान तेरा भला करे। मैं मुस्कराते हुई सोचने लगती हूँ, एक दस का नोट और चार केले देने से भगवान क्या वास्तव में मेरा भला करेगा। जैसे-जैसे मैं उस बुढिया से दूर होती जाती हूँ वैसे-वैसे मैं बचपन में मेरे गाँव में रहने वाली ऐसी ही एक बुढ़िया के पास होती चली जाती हूँ। मेरे मस्तिष्क में उस अपने गाँव की बुढ़िया की यादें ताजा होने लगती है; किस तरह वो आते-जाते गाँव वालों को आवाज लगाती थी। हाँ, इस बुढ़िया में और मेरे गाँव की बुढिया में एक अंतर था। ये बुढ़िया धोती ब्लाउज पहने, सर पर पल्लू रखे थी। पर मेरे गाँव की वो बुढिया पेटीकोट और ब्लाउज में रहती थी। उसके बाल ब्वाॅय-कट कटे हुए थे। उसके हाथ-पैर के नाखून बढ़कर नीचे को मुड़े हुए थे। वो चल फिर नहीं पाती थी, बैठे-बैठे खिसक कर ही इधर उधर जाया करती थी। मैंने उसे कभी खड़ा नहीं देखा।
मैं घर पहुँच कर अपनी माँ को आज बस अड्डे पर दिखी बुढिया के बारे में बताती हूँ और उसको दिये केले के बदले उसकी दुआओं के बारे में भी। वो कहती है, ऐसे आते-जाते गरीबों को कुछ दान-दक्षिणा दे देना चाहिए, ना जाने किस भेष में भगवान परीक्षा ले रहा हो। मैं उसकी बात पर जोर से हंस पड़ती हूँ, वो मुझे घूर कर देखती है। मैं तुरंत साॅरी कहकर तौलिया लेकर बाथरूम की ओर चल देती हूँ और वो मुस्करा कर मेरे लिए चाय बनाने रसोई घर की ओर। मैं भीतर जाते हुए ज़ोर से कहती हूँ लव यू माँ! वो कहती है, तेरा सर! मैं बिना पीछे मुड़े हुए देख लेती हूँ उसका गुस्सा फुर्र से उड़ते हुए।
चाय पीते हुए मैंने माँ से कहा- आज उस बस अड्डे वाली बुढ़िया को देखकर हमारे गांव की लाली बुढ़िया की याद हो आयी। माँ कमरे से बाहर जाते-जाते ठिठक कर रूक गयी, बोली आज तुझे कहाँ से उसकी याद आ गयी। अरे..... लाली बुढ़िया ने भी अपने कर्मों का फल यहीं इस जीवन में जीते जी ही भुगता। मैंने कहा, क्या? वो तो एक भिखारिन थी ना, जो सड़क किनारे बैठकर भीख मांगती थी।
माँ बोली- वो पैदाइशी भिखारी नहीं थी, वो तो अपने कर्मों से और कुछ बीमारी की वजह से भिखारी बन गयी। माँ ने मुझे बताया कि जब माँ शादी के बाद ससुराल आयी थी तब माँ ने भी लाली बुढ़िया को अपने घर के बाहर बैठे हुए ही देखा। मेरी दादी ने माँ को उसकी कहानी सुनाई थी, किसी समय वो मेरी दादी की पड़ोसन हुआ करती थी। दादी ने बताया था कि- वो एक समय बहुत रईस हुआ करती थी। पर समय की ऐसी मार पड़ी कि वो भीख पर पलने वालीे भिखारिन होकर रह गयी।
उसके पति राम चंदर बाबू रेलवे से रिटायर होकर हमारे गाँव मिट्ठीबेड़ी आये, वहाँ आकर कुछ समय तो वे एक किराये के मकान पर रहे। वहाँ गाँव में एक सेठ की एक आलीशान हवेली बन रही थी। सेठ को व्यवसाय में बड़ा घाटा लग गया जिसकी वजह से उसे वो अधूरी बनी हवेली बेचने की नौबत आ गयी। तभी इन लोगों ने वो हवेली सेठ से औने-पौने दाम में खरीद ली। सेठ बड़े शौक से हवेली का निर्माण करवा रहा था, पर उसे कर्ज की मार और रूपये पैसे की तंगी में हवेली बेचनी पड़ी।
उस हवेली से ही गाँव की हद शुरू होती थी, यानि कि हवेली गाँव के प्रवेश द्वार पर पड़ती थी। चूंकि वे लोग कलकत्ता से आये थे, उनके घर में कलकत्ता से लाया गया बेशकीमती साजो-सामान था। पूरी हवेली की शान बढ़ाता हुआ छत से लटकता हुआ चमकदार रंगीन कांच का फानूस (झूमर) जो कभी पैराफिन वैक्स और कभी तेल भर कर जलाया जाता था। उस पर की गयी बेल बूटों की नक्काशी हवेली और उसमें रहने वालों की वैभव गाथा गाती प्रतीत होती थी। जिसके चलते आने-जाने वाले लोगों की निगाह हवेली पर टिक जाया करती थी।
राम चंदर बाबू की पत्नी का नाम रत्ना था, रत्ना देखने में अपने नाम के अनुरूप ही खूबसूरत थी। रंग ऐसा उजला जैसे- दूध में चुटकी भर केसर घुला हो। बड़ी-बड़ी आँखों में कोर से बाहर तक खिंचा सूरमा देखने वालों को सम्मोहित कर लेता था। कलकत्ता रहकर आयी थीं सो बंगाली महिलाओं की तरह माथे पर सिक्के के आकार की बिंदी लगाती थी। कानों मंे लटकती बड़ी-बड़ी सोने की बालियां उसके मुख पर चार चाँद लगाते थे। हर कोई एक नज़र हवेली को और एक झलक रत्ना की पाने के लिए उस ओर टकटकी लगाये देखता। अपने रूपये-पैसों की चमक से गाँव वालों पर अपना रूआब डालकर रत्ना फूली नहीं समाती थी। परंतु राम चंदर रत्ना के विपरीत थे। वे पैदायशी रईस थे, सो उन्हें रूपये-पैसों की नुमाइश का कतई शौक नहीं था। उनका एक बेटा था जिसका नाम रूपेश था। जो दोनों के लाड प्यार से थोड़ा जिद्दी स्वभाव का था। दोनों पति-पत्नी शौक़ीन मिज़ाज के थे। आये दिन मेहमानों से उनका घर भरा रहता था। मेहमानों के लिए लज़ीज पकवान बनाए जाते थे।
राम चंदर जी खूब पढ़े-लिखे होने के साथ-साथ गाने-बजाने का भी खूब शौक रखते थे। उनके पास एक पियानो भी था, जिसे वे कलकत्ता से ही अपने साथ ले आये थे। जब शाम के धुंधलके में वो पियानो का साज छेड़ते तो घर के बाहर आस-पास के लोगों का अच्छा खासा जमावड़ा लग जाता। उनके घर के बाहर एक बग्घी और कोचवान हमेशा खड़े रहते थे। रामचंदर और रत्ना कभी-कभार दिन ढलने से पहले बग्घी में बैठकर पूरे गाँव का एक चक्कर लगा आते, आते-जाते वे आपस में अंग्रेजी में बड़ी नफ़ासत से बात करते। गाँव वाले उनके सड़क से गुजरने पर ऐसे देखते मानो किसी राजा साहेब की सवारी को जाते देख रहे हों। रत्ना जितनी नफ़ासत दिखाती थी उतनी तहज़ीबदार वो वास्तव में शायद नहीं ही थी। तभी सड़क पर चलते लोगों की परवाह किये बगै़र पान का पीक थूक देती। लेकिन राम चंदर बाबू को किसी ने ऐसा करते कभी ना देखा था। इसलिए गाँव वाले उनका मान करते थे।
कुछ ही महीनों में सारा गाँव उनको जानने लगा था, गाँव वाले अपने घरों के शादी-ब्याह व अन्य अवसरों पर उन्हें भी आमंत्रित करने लगे। ऐसे समय में रत्ना का बनाव-श्रृंगार देखने लायक होता था। वो बहुत कम समय के लिए ऐसे समारोहों में शामिल होती और जितनी देर वहाँ रूकती सबकी नजर उस पर ही टिकी रहती।
उनका बेटा शहर के नामी स्कूल में पढ़ता था, पर कुछ दोस्तों की बुरी संगत की वजह से वो गलत रास्ते पर चलने लगा। स्कूल से घर आने की जगह वो दोस्तों के साथ घूमने-फिरने निकल जाता और अपनी रईसी दिखाते हुए वो दोस्तों पर रूपये उड़ाने लगा। आये दिन वो दोस्तों के साथ पीने-पिलाने निकल जाता। पार्टी के लालच में उसके दोस्तों की संख्या दिनांे-दिन बढ़ने लगी। खर्चे बढ़ने के साथ-साथ; जब उसका जेबखर्च नहीं बढ़ा तो वो अपने ही घर से पैसे चुराने लगा। जिसकी भनक घर पर किसी को नही चली। धीरे-धीरे उसकी चोरी की आदत बढ़ती चली गयी। रत्ना को उस पर शक भी हुआ पर वो बेटे के प्यार में अंधी थी, उसने राम चंदर से इसका जिक्र तक नहीं किया। जिससे रूपेश को शय मिली और वो उसी तरह रूपये चुराकर मनमानी करता रहा।
समय हमेशा एक सा किसी का नहीं रहता, समय ने करवट बदली और परेशानियों ने रामचंदर के घर की ओर मुंह कर लिया। उसको दमा (अस्थमा) की शिकायत पहले से थी, पर यहाँ के मौसम में उसकी यह तकलीफ दिनों-दिन बढ़ने लगी। उसको रात-रात भर दमा का अटैक सोने नहीं देता था। खाने-पीने के शौकीन होने की वजह से वे खाने-पीने का परहेज नहीं करते थे। जिस कारण बीमारी बढ़ती चली गयी। उन्हें इलाज के लिए दिल्ली ले जाना पड़ा। बेटा यहाँ अकेला रह गया। अब वो अपनी मर्जी का मालिक बन गया था। वहाँ दिल्ली में इलाज के दौरान उनका सामान चोरी हो गया। यहाँ बेटे ने कुछ लोगों से रूपया उधार ले लिया। बड़ी हवेली देखकर लोग उसे उधारी आसानी से दे देते थे। उसने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।
राम चंदर और रत्ना के दिल्ली से लौटने पर उन्हें पता चला कि रूपेश ने कई लोगों से उधारी की हुई है। उन्होंने जैसे-तैसे लोगों के रूपये लौटाये। इस बार रत्ना ने रूपेश से साफ कह दिया कि वो आईंदा ऐसी हरकत ना करे, वर्ना वो उसके पिताजी से उसकी शिकायत कर देगी। इन सबका रूपेश पर कोई असर नहीं हुआ। वो रत्ना के हाथ से निकल चुका था।
राम चंदर ने बग्घी बेच दी और कोचवान की भी छुट्टी कर दी। राम चंदर को कुछ दिन तो आराम रहा परंतु उसकी बीमारी एक बार फिर बढ़ गयी। वो रात-दिन खांस-खांस कर हलकान होता रहा। रत्ना उसे लेकर डाॅक्टर के पास गयी। डाॅक्टर ने बताया कि उसका इंफेक्शन काफी बढ़ गया है। एक टेस्ट कराने को कहा और जिसका शक डाॅक्टर को था, वही निकला। टेस्ट में टी0बी0 की पुष्टि हुई। उस समय तक टी0बी0 का पूरी तरह कामयाब इलाज हमारे देश में नहीं था। टी0बी0 एक जानलेवा बीमारी की श्रेणी में आता था। साथ रहने वाले को भी उससे परहेज रखना पड़ता था। रत्ना के लिए मुश्किलों का दौर शुरू हो गया। रूपेश को अपने आवारागर्दी से ही फुरसत नहीं थी वह घर के प्रति किसी भी तरह की कोई जिम्मेदारी का ख्याल नहीं रखता था।
लगभग तीन महीने तक दमा और टी0बी0 से लड़ते-लड़ते अंत में राम चंदर ने जीवन से हार मान ली। उसके आखिरी समय में भी रूपेश ना जाने कहाँ था, उसका इंतजार करते-करते राम चंदर की अंतिम यात्रा बेटे के बगैर चल पड़ी।
अब रत्ना हवेली में नितांत अकेली हो गयी थी। कुछ परिचित उसके घर आते, वो कुछ देर रत्ना के साथ बैठते, समय बिताते चले जाते। वो अपने बचे-खुचे धन से घर का खर्च चला रही थी। धीरे-धीरे उसका संचित धन समाप्त होने लगा और धीरे-धीरे आने जाने वालों ने भी उससे कन्नी काटनी शुरू कर दी।
रूपेश का जब मन करता वो घर आता, जब मन करता चला जाता। रत्ना को बेटे से यूं भी कोई उम्मीद भी नहीं थी। वो दिन भर पड़ी-पड़ी आँसू बहाती और अपने बीते दिन याद करती। कभी-कभी तो वो इतनी बेसुध हो जाती कि उसे खाने-पीने का होश नहीं रहता। धीरे-धीरे लोगों ने उसके घर आना-जाना छोड़ दिया।
एक दिन वो रात को घर से बाहर आयी, उसका पैर फिसला और वो लकड़ी के ढेर पर गिर पड़ी। कुल्हाड़ी से फाड़ी हुई लकड़ियों के ढेर पर वो ऐसे गिरी कि लकड़ी के छिसके उसके जांघ पर धंस गये। रात अधिक होने की वजह से वो किसी को मदद के लिए बुला ना सकी। सुबह जब लोगों को पता चला तो कुछ लोग उसे अस्पताल ले गये। वहाँ उसे भर्ती करवा दिया गया, कुछ दिन उसका वहाँ इलाज चला। उसको अस्पताल में बेचैनी होने लगी। उसने डाॅक्टर से डिस्चार्ज कर देने के लिए कहा। घर आने के कुछ समय बाद जब उसने उठने की कोशिश की तो उसे बहुत तेज दर्द महसूस हुआ। वो खड़ी नहीं हो पा रही थी, दर्द असह्य था। उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी। कुछ दिन दया करके पड़ोसी उसके खाने का इंतजाम करते रहे। सबने रत्ना को खड़ा करने की कोशिश की पर रत्ना उठ नहीं पा रही थी। जैसे ही वो उठने की कोशिश करती दर्द से कराह उठती। उसने उठ पाने में असमर्थता जताई। उसका पैर जाम हो चुका था, वो पैर को लम्बा नहीं कर पाती थी। वो बैठे-बैठे चलने लगी। घाव दबे रहने के कारण सूख नहीं पाया, उसका घाव सड़ने लगा।
रूपेश जब-जब घर रहता तो माँ की कुछ मदद करता और जाते हुए रूपये मांगता। एक दिन उसने अपने पिता की पेंशन के कागज़ात गिरवी रख दिये। रत्ना तो चलने-फिरने से लाचार हो चुकी थी। उसे तो तब पता चला जब लोगों ने उसे बताया कि किसी लाला के पास रूपेश ने कर्जा लिया है और पेंशन का पट्टा गिरवी रख छोड़ा है। रत्ना दहाड़ें मार कर रोने लगी, पर उसको सुनने वाला कोई नहीं था।
कुछ समय बाद रूपेश ने घर का सामान बेचना शुरू कर दिया। एक साल तक ये सिलसिला चलता रहा। एक दिन पता चला कि कहीं चोरी के इल्ज़ाम में रूपेश को पुलिस पकड़ कर ले गयी। उसके साथी जमानत में छूट गय,े परन्तु उसको जेल हो गयी। इसके बाद तो हालात बद से बदतर होते चले गये। घर का सारा सामान बिक चुका था। इस लाचारगी पर रत्ना दिन भर आँसू बहाती, अकेले में बड़बड़ाती, कभी आसमान की तरफ हाथ उठाकर रोते हुए कुछ कहती, कभी आते-जाते लोगों के मदद ना करने पर उन्हें कोसती, गालियाँ देती।
अब लोगों ने उसकी ओर ध्यान देना छोड़ दिया था। उसके उलझे बाल, अस्त-व्यस्त कपड़े धीरे-धीरे उसके घाव में कीड़े पड़ने लगे। बग्घी में घूमने वाली रत्ना अपने ही घर के बाहर बैठ कर भीख मांगने पर मजबूर हो गयी। वो आने-जाने वालों को आवाज लगाकर कहती- भूख लगी है कुछ दे दो खाने को।
किसी ने दया करके उसके लिए लकड़ी के फट्टों से एक हाथ गाड़ी बनवा दी थी। जिस पर चार पहिये लगे थे। वो उस पर बैठकर हाथ में दो लकड़ी के फट्टों से जमीन पर टेक लगाती और आगे बढ़ती। इस गाड़ी के सहारे अब वो गाँव से बाहर जाने लगी। इसी तरह घूमते हुए दो-चार महीने वो गाँव से बाहर मुख्य सड़क पर पेड़ों के नीचे रहती और फिर ऐसे ही कभी वापस गाँव लौट आती। धीरे-धीरे लोग उसे लाली बुढ़िया के नाम से जानने लगे।
माँ ने बताया कि कई बार उसके गाँव लौटने पर वो देखते कि उसके हाथ-पाँव के नाखून बड़े होकर नीचे को झुक गये हैं। तो वो कभी कैंची और कभी ब्लेड से उसके नाखून काट देती थी। उसको हाथ मुंह धोने के लिए गरम पानी रख आती। दिन के एक समय का खाना और शाम की चाय दे आती। सुबह की चाय और रात का खाना उसकी हवेली (जो अब खण्डहर में तब्दील होती जा रही थी) के सामने रहने वाले एक सज्जन के घर से आता था।
एक दिन खबर मिली कि हमारा गाँव जहाँ हम रहते थे, भारतीय सैन्य अकादमी के प्रशिक्षण क्षेत्र में तब्दील करने हेतु स्वीकृत हो गया है। सरकारी आदेशानुसार सबको वो जगह खाली करनी थी। सारे गाँव वालों को जमीन की कीमत लेकर घर खाली करने के आदेश आ गये। गाँव वालों को साल भर का समय दिया गया था। लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। सरकार जमीन का औने-पौने कीमत दे रही थी। उस कीमत में अन्यत्र जमीन ढूंढना बहुत मुश्किल था। परन्तु सभी अपने सामथ्र्यानुसार जमीन खरीद रहे थे।
हम भी अन्यत्र जाकर बस गये। उस गाँव की घेराबंदी कर दी गयी थी। सब उस लाली बुढ़िया को भूल-भुला गये। कुछ समय बाद पता चला कि उसे सड़क किनारे से उठाकर किसी ने अस्पताल में डाल दिया था, पर वो वहाँ से निकल गयी। पंडितवाड़ी नाम से एक इलाका है वहाँ जानकीदास हत्था नाम से कुछ पुराने क्वार्ट्र्स थे। जिसके गलीनुमे पूरे रास्ते पर छत पड़ी हुई थी। कहते हैं अपने अंतिम दिनों में वो लाली बूढ़ी उस जगह पर काफी समय रही। ये जगह उसके गाँव यानि मेरे गाँव के करीब थी।
रत्ना जब नई-नई गाँव आई थी तो किसी ने ख्याल में भी उसका ऐसा दर्दनाक अंत नहीं सोचा होगा। परंतु भविष्य एक ऐसा रहस्य है जिसे आज तक कोई जान नहीं सका है। माँ ने बताया कि कुछ समय बाद गाँव के दूर बिंदाल पुल पर एक सर्द सुबह एक भिखारिन का शव पड़ा मिला। लोग बता रहे थे कि उसका हुलिया लाली बुढ़िया जैसा था।
लाली बुढ़िया तो समय के फेर में बह गयी लेकिन उसकी लकड़ी की हथगड्डी वहीं रह गयी...