रुग्ण रूग्णालय
क्लान्त मुख लिये माँ
आज भी
राह देख रही उस छौने की,
घंटों जिसको देख तड़पता
रूग्णालय भी रोया था
अपनी लाचारी पर उसने भी
नाम बदल दूँ सोचा था,
कहाँ बन पाया था वो आलय
आने वाले रूग्णों का;
ठगालय रख दो
नाम बदल कर
एक प्रस्ताव भेजा था ।
घंटों जिसको देख तड़पता
रूग्णालय भी रोया था
अपनी लाचारी पर उसने भी
नाम बदल दूँ सोचा था,
कहाँ बन पाया था वो आलय
आने वाले रूग्णों का;
ठगालय रख दो
नाम बदल कर
एक प्रस्ताव भेजा था ।
छौने तो फिर छौने थे
वो कहाँ कुछ देर रूक पाए,
जब तक साहेब सब जागते
वो लम्बी नींद में चले गए।
माँ को खबर भी नहीं लगी
वो कब तक आंचल में थामे
ममता का पंखा झलकाती रही।
कितने नन्हे मुन्ने इस
लापरवाही की भेंट चढ़ गए।
वो कहाँ कुछ देर रूक पाए,
जब तक साहेब सब जागते
वो लम्बी नींद में चले गए।
माँ को खबर भी नहीं लगी
वो कब तक आंचल में थामे
ममता का पंखा झलकाती रही।
कितने नन्हे मुन्ने इस
लापरवाही की भेंट चढ़ गए।
माँ तो फिर माँ है
क्लान्त मुख लिये माँ
आज भी
राह देख रही उस छौने की।।
क्लान्त मुख लिये माँ
आज भी
राह देख रही उस छौने की।।
अनीता मैठाणी
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