Friday, 22 September 2017

बारिश से तुम



बारिश से तुम
लो ...
आ गयी बारिश,
कभी तुम भी आया करो
बारिश की तरह!
ये क्या!
बारिश में ये जो रेत की सी महक है 
हैरान हूँ मैं, कि; ये तुम हो 
आज मैं तुम्हें देखूं कि; भीग जाऊं बारिश में
रूक-रूक के गिरती हैं बूंदें 
ज्यों तरसाना तुम्हीं से सीखा है,
कह दो कि; तुम शामिल हो आज बारिश में।
बहुत दिन हुए 
तुम्हारे संग कविता कोई खेले;
बरसते हुए बादल
जो ये आज घुमड़ते हैं 
ठिठोली है तुम्हारी 
तभी; पहचाने से लग रहे हैं। 
इतनी आवेग से जो आये हो 
फिर भी कितना सुकूं है।
धूप खिल आई 
तुम्हारे बरस जाने के बाद 
ये; तुम कितना ख्याल रखते हो मेरा 
और जो, अब बरस रहा है नन्हीं बूंदों सा 
वो जैसे खिलखिलाते हो तुम मेरी बातों पर...
बूंद के दसवें हिस्से सा नन्हा, हल्का, कोमल 
इतना प्यारा कि; 
इस, तुम को मैं सारा समेट रही हूँ! 
जाओ...
अब मुझे फुर्सत नहीं है फुर्सत में भी, 
इन्हें रखना है सहेज कर बूँद की तरह 
हम्म बूँद की तरह...
कि; ये तुम हो, 
मेरे हिस्से के तुम बस्स तुम...
अनीता मैठाणी

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