मंत्रमुग्ध सी मैं और गुह्य मंत्र से तुम ...
मंत्र!
हाँ मंत्र ही तो हो तुम
और मंत्रमुग्ध सी मैं।
हाँ मंत्र ही तो हो तुम
और मंत्रमुग्ध सी मैं।
दिन-रात दोहराती हूँ तुम्हें
दोहराना भी कहाँ निरंतर हो पाता है
बीच में रात जो आ जाती है
नींद लेकर,
और नींद आती है सपने लेकर,
नींद में भी तुम्हें ही दोहराती हूँ
और सपने;
वो तो तुम्हें जपते हुए ही आते हैं।
दोहराना भी कहाँ निरंतर हो पाता है
बीच में रात जो आ जाती है
नींद लेकर,
और नींद आती है सपने लेकर,
नींद में भी तुम्हें ही दोहराती हूँ
और सपने;
वो तो तुम्हें जपते हुए ही आते हैं।
जब जपते-जपते तालु से
जिह्वा चिपक जाती है।
तब बंद आँखों में उठकर
टटोलते हुए गटक जाती हूँ
पूरी बोतल पानी के साथ
पुनः तुम्हें जपने के लिए।
जिह्वा चिपक जाती है।
तब बंद आँखों में उठकर
टटोलते हुए गटक जाती हूँ
पूरी बोतल पानी के साथ
पुनः तुम्हें जपने के लिए।
तभी सुबह नहीं खुल पाती
मंत्र जाप से थकी आँखें...
तथापि उठती हूँ
जपने को मंत्र।
मंत्र जाप से थकी आँखें...
तथापि उठती हूँ
जपने को मंत्र।
हाँ मंत्र ही हो तुम मेरे लिए...
गुह्य मंत्र-
जिसे जपते रहने के बाद भी मैं
अनभिज्ञ रही आशयों से ...
मंत्र का जाप-
मन के भीतर के आंदोलनों को
शांत कर देता है,
परंतु ये मंत्र हर जाप के साथ
गुह्य होता जाता है...
मंत्रमुग्ध सी मैं और गुह्य मंत्र से तुम ...
गुह्य मंत्र-
जिसे जपते रहने के बाद भी मैं
अनभिज्ञ रही आशयों से ...
मंत्र का जाप-
मन के भीतर के आंदोलनों को
शांत कर देता है,
परंतु ये मंत्र हर जाप के साथ
गुह्य होता जाता है...
मंत्रमुग्ध सी मैं और गुह्य मंत्र से तुम ...
अनीता मैठाणी

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