#राशिद##
मैंने
सब्जी वाले से पूछा कितने हुए पैसे। उसका मुंह भरा हुआ था, मुंह आसमान की ओर उठाते
हुए बोला पचहत्तर। मैंने कहा कैसे, तो वो थूकने चला गया और आकर लगा
गिनाने- 20 की
तोरी, 25 का गोभी और 30 का
टमाटर। मैंने कहा ठीक है ये लो पैसे। और ये बताओ मुंह में क्या भरा है। वो बोला, दीदी गुटका। मैंने कहा-
छिः गलत बात है, कितने
साल के हो। वो बोला- उन्नीस का। मैंने कहा कब से खा रहे हो ये जहर, वो हँसने लगा। उसकी
ठेली के ठीक बगल में एक पान का खोखा था। मैंने वहाँ लटक रहे एक गुटके के झालर को
खींच कर उसको दिखाते हुए कहा, ये देखो इस पर लिखा है इसको खाने से
कैंसर होता है।
वो
कहने लगा बस दीदी कोई दस एक साल से, जब से अब्बू के साथ ठेली पर
बैठने लगा। यहाँ तो सभी चबाते हैं, पता नहीं चला कब आदत लग
गयी। मैंने कहा देखो, जब मैं अगली बार आऊँ, तो
तुम ये खाते हुए ना दिखो। ठीक है वरना मैं तुमसे सब्जी नहीं खरीदूँगी। उसने मेरे
जाते-जाते मग का पानी मुंह में भरकर कुल्ला किया और मैं अपने बेटे का हाथ पकड़कर
वहाँ से आ गयी।
लगभग
15 दिन बाद जब मेरा वहाँ जाना हुआ तो वो मुस्कराता हुआ मिला, मेरे
कुछ बोलने से पहले बोल पड़ा- दीदी आप आसपास किसी से भी पूछ लो मैंने गुटका खाना
बहुत कम कर दिया है। मैंने कहा- क्या? कम किया है यानि की बंद
नहीं किया। तो वो बोला - दीदी झूठ नहीं बोलूंगा,
अभी
कम किया है, धीरे-धीरे छोड़ दूंगा।
मैं
वापसी में रास्ते भर मुस्कराती रही, ये सोचकर कि वो कोशिश कर
रहा है एक दिन जरूर कामयाब होगा। इसमें उसका दोष नहीं है जब बच्चे अपने बड़ों को
सहज ही किसी चीज को करते हुए देखते हैं तो उसे अपना लेते हैं। और ये गलत आदतें और
व्यसन कब परम्परा बनती चली जाती हैं पता ही नहीं चलता। सिर्फ अज्ञानता और अनदेखी
के चलते।
अनीता
मैठाणी
