अंतर्राष्ट्रीय महिला
दिवस पर
कब टूटेंगी ये वर्जनायें]
जो चस्पा कर दी गयी हैं उसके जन्म के साथ]
जाने किसने\
क्या\
जब इस मिथक से हटकर कुछ करने की सोचती हैं]
हममें से ही कुछ] तो हममें से ही कुछ उसे
टटोलती हैं शक-ओ-सुबह से!
मन में एक लडखड़ाता सा विश्वास
या यूं कहें अविश्वास लिए]
कि- क्या ये कर पायेगी]
तब ये नहीं हो पाता हमसे कि
हम सब साथ दें] चल पड़ें अपना नहीं तो
उसका ही साथ दें जो कर रही है ये प्रयास कि&
टूटे वो वर्जनायें
जिसे हम अब और नहीं ढो सकते।
हाँ] ढोना ही नहीं चाहते।
अनीता मैठाणी
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