Sunday, 12 March 2017

होली.....

होली.....

होली का रंग हाथ से उतर कर
चेहरे को गुलाबी करता हुआ
मन में बस जाता है,
याद बनकर।
हर साल बढ़ती उम्र के साथ
होली का रंग और स्वरूप
बदलता चला जाता है।

इस बरस होली कुछ ख़ास है,
पहाड़ों ने फिर से मखमली बर्फ की चादर ओढ़ ली है।
और गाँवों ने ओढ़ ली बासंती बयार्।
अबीर, गुलाल, बुरांस, फ्यूंली, टेसू के रंग
गाँव की धार में उड़ते हुए,
गीले गातों पर चिपक रहे हैं।

फागुनी बयार् से सराबोर मन भागने लगा है,
सोचते हुए कि;
फिर बसंत के साथ बिदा हो जाएगा हेमंत।
और फिर-
अगले बरस फूलों की मुस्कुराहट और खुशबू
साथ लिए फिर आएगा बासंती बयार् के साथ,
शीत के बाद फिर-फिर बसंत।

अनीता मैठाणी

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