मेरी कविता
वक़्त की रफ्तार से
तेज हो गयी
स्मृतियाँ
तुम्हेँ स्मरण करातीँ
है कि तुम
जब तुम होते हो
साथ
सब कुछ हल्का
उड़ने लगता है-
फलक के पार
अनन्त ब्रह्माण्ड की
ओर
न होना.. पास भी लगता है..
पर तुम हो
तुम हो फलक के नीचे जमीं पर साथ साथ......
वक़्त की रफ्तार से
तेज हो गयी
स्मृतियाँ
तुम्हेँ स्मरण करातीँ
है कि तुम
जब तुम होते हो
साथ
सब कुछ हल्का
उड़ने लगता है-
फलक के पार
अनन्त ब्रह्माण्ड की
ओर
न होना.. पास भी लगता है..
पर तुम हो
तुम हो फलक के नीचे जमीं पर साथ साथ......
अनीता
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