Saturday, 21 January 2017

कभी लगा पढ़ा लिखा समाज अनपढ़ है-

आज लड़कियों के पहनावे को लेकर जो बवाल मचा हुआ है या यूं कहें कि वर्ष 2017 के आगाज़ के पहले दिन हमारे देश की सिलिकाॅन वैली बंग्लौर के सर्वाधिक माॅडर्न आधुनिक तकनीकी ज्ञान वाले नवधनाढ्य वर्ग और 21वीं सदी के युवाओं ने जो हरकतें नये वर्ष का उत्साह मना रही महिलाओं और युवतियों के साथ की उसकी जितनी भी निंदा की जाए शायद कम ही होगा। ऐसे में यह कहा जाना अनुचित नहीं होगा कि आज के इस काल खण्ड में सबसे ज्यादा अनपढ़, गंवार और बेशर्म- बंग्लौर में महिलाओं से अश्लीलता करने वाला पढ़ा-लिखा समाज ही है। 
नये साल के जश्न के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में इस प्रकार की घटनायें और भी सुनाई दी। इस बारे में सोचते हुए यह लगता है कि इन सांस्कारिक पृष्ठभूमि और तथाकथित आधुनिकता के फूहड़ मनोविकृति वाले इस समाज से अच्छे तो वे मजदूर और गरीब वर्ग के या निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों के सदस्य हैं जो भारत के अन्य महानगरों की तरह यहाँ देहरादून में राजधानी के नवनिर्माण में लगे हैं। मैंने इस शहर में बन रहे बड़े निर्माण कार्यों में लगे मजदूर वर्ग के परिवारों की कामगार महिलाओं और पुरूषों को बिना बाथरूम की सुविधा वाले स्थानों पर सीमित कपड़े लपेटे खुले में स्नान करते हुए देखा है। तब सोचती हूँ कि क्या लड़कियों या महिलाओं के पहनावे से ही क्या पुरूष वर्ग को ये कैसे लगने लगता है कि जिस महिला या युवती ने आधुनिकयुगीन पहनावे को अपनाया है वह तथाकथित संकीर्ण मानसिकता वाले पुरूष वर्ग के लिए एक सरल सहज रूप से उपलब्ध वस्तु है या माल है। अगर ऐसा ही हो तो फैशन शो में जाने वाले दर्शक तो माॅडल्स को रैम्प पर चलने ही ना दें। नये साल की मस्ती शराब और ड्रग्स का सुरूर, न घरवालों का डर, पुलिस और प्रशासन की लचर सुरक्षा व्यवस्थायें, उद्दण्डी और गैर-जिम्मेदार लेकिन अधिक पैसा कमाने वाले संचार तकनीकी युग के प्रतीक ये युवा महिलाओं का आदर तक करना नहीं जानते। घुटने से ऊपर तक के वस्त्र पहने युवती ही इनकी हवस या छेड़छाड़, ईव टीज़िंग का शिकार हुई हों ये सच नहीं है। 
पूर्णतः भारतीय वेशभूषा में साड़ी-धोती लपेटे या बुर्का ओढ़े महिलाओं को भी पितृसत्तात्मक पुरूष समाज सिर्फ उपभोग की वस्तु समझता है। जहाँ महिलायें और युवतियां तकनीकी शिक्षा, लेखन, संगीत, नृत्य, खेलकूद, व्यापार सहित अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ने लगती हैं वहीं पुरूष समाज (हमेशा नहीं) भीतर ही भीतर अह्म, अहंकार  और पुरूषत्व के तथाकथित झूठ के साथ कुत्सित् विचारधाराओं के साथ महिलाओं को छेड़छाड़ या ईव-टीज़िंग का साधन समझने लगते हैं। यह वास्तव में संस्कार और लालन-पालन पोषण के तौर तरीकों में किसी ना किसी कमी को उजागर करते हैं। उत्सवों और चैराहों पर बिखर जाता है। यह स्थिति महिलाओं से ज्यादा पुरूष समाज के लिए चिन्ताजनक होनी चाहिए। या वे महसूस करें कि अकेली युवती, बच्ची और महिला उसके लिए अवसर नहीं हैं बल्कि उसकी सुरक्षा करना उसकी जिम्मेदारी की पहली सीढ़ी है। 



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