Monday, 30 January 2017

अनन्त तक....


लगता है तुम आस पास ही हो
बिल्कुल पास;
स्पर्श तो नहीं कर सकती
पर;
महसूस करती हूँ रोज हर पल-पल,
जीवन रफ्तार पर है सतत् प्रवाहमान् समय के साथ
पर;
तुम अनुभूति हो गये हो, सस्नेह
लगता है जैसे मिट्टी का भुरभुरापन
हाथों में महसूस हो रहा हो और हो;
शीतल बर्फ कणों का ठंडा चुभन भरा
अहसास।।

तुम ऊष्मा हो, प्रायाण भी हो जीवन का
प्रेम की अनुभूति हो, आंसू भी हो,
तुम्हारे स्नेह की अनुभूति
जीवन की रफ़्तार कभी बढ़ जाती है तुम्हारे
मधुर हाथों के मुलायम कोमल प्यार भरे स्नेह से
गुस्सा काफूर हो जाता है!

छू दूँ तो पाती हूँ प्यार भरा स्नेहिल
ऊष्मित हाथों की हथेलियों की छुअन;
तेज सांसों का उतार-चढ़ाव
हृदय/दिल की धड़कन की धीमी ध्वनि
सब याद दिलाती रहेंगी अनन्त तक,
अनन्त प्यार तुम्हारा।।
अनीता

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