Monday, 23 January 2017



तुम कहाँ हो 
तुम जहाँ भी हो,
 जहाँ कहीं भी हो;
  बस; रेतीला स्पर्श न हो;
   तट पर रहकर तुम
     नदी से दूर न हो,
      बताओ तुम कहाँ हो.
अँधेरे भी घुप्प अँधेरे नहीं तुम बिन;
  उजाला भी है उदास लगता- तुम बिन,
   तुम लगते हो छा गए मेरे - भूत, वर्तमान व् भविष्य के अस्तित्व पर,
     तुम जहाँ भी हो- मेरे आस पास ही हो
      हमेशा-हमेशा 
रात का बियाँबान सन्नाटा काटता है!
  दिन का उजाला शहर छानता है!
    सडकों पे चलते काँपता है मन;
      धड़कती धमनियां तरल रक्त उफनता है;
        दिलो दिमाग पर है - यादें तुम्हारी
          स्मृतियाँ, स्नेह तुम्हारा, नर्म स्पर्श हाथों
            का बाल सहलाता है-
बताओ तुम कहाँ हो - यहाँ हो कि वहाँ हो !



*अनीता 

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