Saturday, 28 January 2017

बेटा ना होने का ऐसा गम तो नहीं देखा मैंने कभी अपने मम्मी-डैडी के चेहरे पर। और किसी बात में कभी ऐसा महसूस भी नहीं होने दिया उन्होंने। पर एक बार बातचीत के दौरान मैंने मम्मी को किसी से कहते सुना कि फलां के एक बेटा और एक बेटी है भगवान से मांगे हुए जैसे। कुछ दिन लगातार मेरे जेहन में बिन मांगी मुराद सा पैदा हो जाने की फीलिंग आती रही। 

हम दो बहनें थीं, बात उन दिनों की है जब हम मुम्बई (उस समय बम्बई कहा करते थे) में रहा करते थे। मम्मी की आस-पास की सहेलियां मम्मी को हिदायत देतीं, हमसे कहती तुम्हें भाई चाहिए या बहन। मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था, ये सब क्या कह रही हैं। कहाँ से आयेगा भाई-बहन? आजकल के बच्चों की तरह स्मार्ट नहीं थे हमारे दौर के बच्चे, ना ही टी0वी0 पर ऐसा कुछ दिखाया जाता था जिससे हमें कुछ पता चलता। बात उस दौर की है जब हम टी0वी0 देखने भी आर्मी एरिया के अंदर जाते थे, वो भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन। काॅलोनियों में दोनों ओर की बिल्डिंग पर बड़े से पर्दे पर फिल्में दिखाई जाती थी। ऐसे ही किसी पर्दे पर मैंने हेमा मालिनी की एक पिक्चर देखी थी- धर्मात्मा। 

एक दिन जब हम सुबह उठे तो पता चला कि मम्मी घर पर नहीं है। रात को मम्मी को अस्पताल ले गये थे। मैंने देखा डैडी शेविंग कर रहे थे जो उनका रोज का काम था। एक छोटा सा फोल्डिंग वाला आईना पकड़े जिसे वो बीच-बीच में टेबल पर रख देते जब उन्हें एक हाथ से गाल को एक ओर खिंचना होता था जिससे रेज़र से गाल कट जाये। उन दिनों मेरी एक दीदी आयी हुई थी हमारे साथ रहने को वो हमें दूध का कप दे रही थी पीने को। तभी रेडियो में एक गाना बजना शुरू हुआ- मेरे घर आई एक नन्हीं परी, एक नन्हीं परी..... । अभी एक लाईन भी पूरा नहीं हुआ था कि मेरे डैडी ने उठकर रेडियो आॅफ कर दिया। तब दीदी ने बताया तुम्हारी छोटी बहन हुई है। जब तुम स्कूल से आ जाओगे तब चलेंगे मम्मी और बच्चे से मिलने अस्पताल। शाम को हम सब नेवी नगर कोलाबा स्थित अश्विन हाॅस्पिटल पहुंचे, जहाँ हम मम्मी और अपनी छोटी बहन से मिले। 

मुझे काफी साल बाद पता चला कि मेरे मम्मी-डैडी बेटे की आस में एक बार हाजी अली की दरगाह पर भी हो आये थे। पर ऊपर वाले ने इस रूप में भी उनकी अर्जी नहीं सुनी। खै़र आज मेरी वही छोटी बहन गुड़गाँव में एक बी0पी0ओ0 में सीनियर पोस्ट पर है। मेरे मम्मी डैडी का उससे स्नेह भी हम दो बड़ी बेटियों से हमेशा ज्यादा रहा। गुजरते समय के साथ लड़के-लड़की का भेद कम हुआ है या वैसा ही है ये कह पाना आज भी हर परिवार और उसके सदस्यों की मानसिकता या सोच पर निर्भर है। परिवार के संस्कार लिंग भेद को समाप्त करने में अपनी बेहतर भूमिका निभा सकते हैं। ये जो आजकल लड़कों को ठीक करने या लड़कियों से सही बर्ताव करने या तमीज से पेश आने की बातें सभी जगह साहित्य से राजनीति तक और गाँव से राष्ट्रीय स्तर तक की जा रही है इस लिंग भेद के दंगल में बेटी या स्त्रियों को भूल कर भी कम ना आंका जाए। मेरा मानना है कि लड़के लड़की में भेद को खत्म करने की शुरूआत हर परिवार को अपने घर से करनी होगी।

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