उड़ता रहा झीना सा पर्दा
टिमटिमाता रहा यादों
का
दिया सा... दिया
सा
तार बजता रहा रुनझुन
सा
दिल का.
समझ पाए जब तलक
दस्तक ये दिल का
तरन्नुम ये दिल का
गुनगुनाने से पहले
शाम होने लगी,
याद धुंधला गई.
भूल जाने से पहले
फिर एक बार
तेरे आने की आहट तो
हो
खनक ऐसी हो
कि;
फिर साज़ ऐसा हो,
दिल के संगीत का
हर अल्फाज़ ऐसा हो
बजता रहे ताउम्र जो
जब तलक देह में जान हो.
देह... में प्राण
हो.
अनीता मैठाणी

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